पुण्य या पाप? निर्जला एकादशी पर शीतल जल सेवा के पीछे छिपी गंदगी की कड़वी हकीकत!
पुण्य या पाप? निर्जला एकादशी पर शीतल जल सेवा के पीछे छिपी गंदगी की कड़वी हकीकत!
जगमाल सिंह प्रजापति/नीमराना/ भीषण गर्मी और तपती धूप से झुलसते राहगीरों को राहत देने के लिए निर्जला एकादशी (और अन्य धार्मिक अवसरों) पर जगह-जगह ‘प्याऊ’ और ‘शरबत सेवा’ के स्टॉल लगाए जाते हैं।
ठंडे पानी, मीठे शरबत और रूहअफ़ज़ा से लोगों का गला तर करना बेशक बेहद पुण्य और परोपकार का काम है। लेकिन, इस पुण्य के तुरंत बाद जो तस्वीर सामने आती है, वह मानवता और नागरिक कर्तव्यों को शर्मसार कर देने वाली है।
प्लास्टिक और डिस्पोजल ग्लास-दोनों की गंदगी का एक लंबा अंबार दिखाई देगा। राहगीर शरबत पीते हैं और खाली ग्लास वहीं सड़क पर, डिवाइडर के बीच या नालियों में फेंक कर आगे बढ़ जाते हैं। कुछ ही घंटों में वह पूरा सेवा स्थल एक डंपिंग ग्राउंड में तब्दील हो जाता है। हवा चलते ही ये प्लास्टिक के डिस्पोजल ग्लास उड़कर पूरी सड़क पर फैल जाते हैं, जिससे न सिर्फ राहगीरों और वाहन चालकों को परेशानी होती है, बल्कि दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है।
क्या ऐसे मिलेगा पुण्य का फल?
सोचने वाली बात यह है कि एक तरफ हम भगवान को याद कर राहगीरों को पानी पिलाकर पुण्य कमा रहे हैं, और दूसरी तरफ उसी जगह पर भारी गंदगी फैलाकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं। बेजुबान जानवर (जैसे गाय और आवारा कुत्ते) इन प्लास्टिक के गिलासों को खाने की तलाश में निगल जाते हैं, जिससे उनकी मौत तक हो जाती है। क्या प्रकृति और बेजुबान जीवों को नुकसान पहुंचाकर कमाया गया पुण्य स्वीकार्य होगा?
